Agni Purana
112
अध्याय 112 / 381

Adhyaya 112

7 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ7 श्लोक

अध्याय 112

श्लोक 1

वाराणसीमाहात्म्यम् अग्निर् उवाच वाराणसी(३) परं तीर्थं गौर्यै प्राह महेश्वरः ।भुक्तिमुक्तिप्रदं पुण्यं वसतां गृणतां हरिं(४)

vārāṇasīmāhātmyam agnir uvāca vārāṇasī(3) paraṃ tīrthaṃ gauryai prāha maheśvaraḥ / bhuktimuktipradaṃ puṇyaṃ vasatāṃ gṛṇatāṃ hariṃ(4)

हिन्दी अर्थ

कालाग्निके समान प्रकाशित हो रहे हैं। नैऋत्य- कोणमें लाल नेत्रवाले नैत्र्त्यकी भावना करे, जो हाथमें तलवार लिये, शव (मुर्दे)-पर आरूढ हैं । पश्चिममें मकरारूढ, श्वेतवर्ण, नागपाशधारी वरुणका

English

(Lord) Mahesvara (Siva) said to Gauri (consort of Siva) that Varanasi is the sacred place. It confers enjoyment and emancipation on those who reside there and recite (the name of god) Hari (Visnu).

अध्याय 112

श्लोक 2

रुद्र उवाच गौरीक्षेत्रं न मुक्तं वै अविमुक्तं ततः स्मृतं ।२ तीर्थं वानरकं परमिति ख॥ , ग॥ , घ॥ , ङ॥ च ३ वाराणसीमिति ख॥ , घ॥ च ४ वसतां शृणुतां हरिमिति ग॥ , घ॥ , ङ॥ च :प् ३७७ जप्तं तप्तं दत्तममविमुक्ते विलाक्षयं

rudra uvāca gaurīkṣetraṃ na muktaṃ vai avimuktaṃ tataḥ smṛtaṃ / 2 tīrthaṃ vānarakaṃ paramiti kha.. , ga.. , gha.. , ṅa.. ca 3 vārāṇasīmiti kha.. , gha.. ca 4 vasatāṃ śṛṇutāṃ harimiti ga.. , gha.. , ṅa.. ca :p 377 japtaṃ taptaṃ dattamamavimukte vilākṣayaṃ

हिन्दी अर्थ

चिन्तन करे। वायव्यकोणमें मृगारूढ, नीलवर्ण वायुदेवका तथा उत्तरमें भेंड्रेर सवार कुबेरका ध्यान करे। ईशानकोणमें त्रिशूलधारी, वृषभारूढ ईशानका, नैत्रक््य तथा पश्चिमके मध्यभागमें कच्छपपर सवार चक्रधारी भगवान् अनन्तका तथा ईशान और पूर्वके भीतर चार मुख एवं चार भुजा धारण करनेवाले हंसवाहन ब्रह्माका ध्यान करे

English

"The sacred place, O Gauri, has never been forsaken (by me) and hence it is called Avimukta. The repetition (of god's names), the performance of penance and giving alms at Avimukta indeed (yields) undiminishing benefits.

अध्याय 112

श्लोक 3

अश्मना चरणौ हत्वा वसेत्काशीन्न हि त्यजेत्(१) ।हरिश् चन्द्रं परं गुह्यं गुह्यमाम्नातकेश्वरं(२)

aśmanā caraṇau hatvā vasetkāśīnna hi tyajet(1) / hariś candraṃ paraṃ guhyaṃ guhyamāmnātakeśvaraṃ(2)

हिन्दी अर्थ

खंभोंके मूल भागमें स्थित कलशोंमें तथा वेदीपर धर्म आदिका पूजन करे। कुछ लोग सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थित कलशोपर अनन्त आदिकी पूजा भी करते हैं। इसके बाद शिवाज्ञा सुनावे

English

It extends to twotyanaj in the east and half syojana in

अध्याय 112

श्लोक 4

जप्येश्वरं परं गुह्यं(३) गुह्यं श्रीपर्वतं तथा ।महालयं(४) परं गुह्यं भृगुश् चण्डेश्वरं(५) तथा

japyeśvaraṃ paraṃ guhyaṃ(3) guhyaṃ śrīparvataṃ tathā / mahālayaṃ(4) paraṃ guhyaṃ bhṛguś caṇḍeśvaraṃ(5) tathā

हिन्दी अर्थ

और कलशोंको अपने पृष्ठभागतक घुमावे । तत्पश्चात् पहले कलशको और फिर वार्धानीको पूर्ववत् अपने स्थानपर रख दे। स्थिर आसनवाले शिवका कलशमें और शस्त्रके लिये ध्रुवासनका पूर्ववत् पूजन करके उद्धव-मुद्राद्वारा स्पर्श करे। उस समय भगवानूसे इस प्रकार प्रार्थना करे-'हे जगन्नाथ! आप अपने भक्तजनपर कृपा करके इस अपने ही यज्ञकी रक्षा कीजिये।'-यों रक्षाके

English

Bathing, muttering (of divine names), oblations (to gods), (one's) death, worship of gods, ancestral rites, alms¬ giving and stay and whatsoever done here is capable of confer¬ ring enjoyment and emancipation.

अध्याय 112

श्लोक 5

केदारं परमं गुह्यमष्टौ सन्त्यविमुक्तके ।गुह्यानां परमं गुह्यमविमुक्तं परं मम

kedāraṃ paramaṃ guhyamaṣṭau santyavimuktake / guhyānāṃ paramaṃ guhyamavimuktaṃ paraṃ mama

हिन्दी अर्थ

लिये प्रार्थना सुनाकर कलशमें खड्गको स्थापना करे। दीक्षा और स्थापनाके समय कलशमें, वेदीपर अथवा मण्डलमें भगवान् शिवका पूजन करे। मण्डलमें देवेश्वर शिवका पूजन करनेके पश्चात्

English

Kedara is supreme and secret; eight are in Avimukta. Of secrets the supreme secret is Avimukta, my supreme.

अध्याय 112

श्लोक 6

द्वियोजनन्तु पूर्वं स्याद् योजनार्धं तदन्यथा(६) ।वरणा च नदी चासीत् तयोर्मध्ये(७) वाराणसी

dviyojanantu pūrvaṃ syād yojanārdhaṃ tadanyathā(6) / varaṇā ca nadī cāsīt tayormadhye(7) vārāṇasī

हिन्दी अर्थ

कुण्डके समीप जाय कुण्ड-नाभिको आगे करके बैठे हुए मूर्तिधारी पुरुष गुरुकी आज्ञासे अपने-अपने कुण्डका संस्कार करें। जप करनेवाले ब्राह्मण संख्यारहित मन्त्रका जप करें। दूसरे लोग संहिताका पाठ करें। अपनी

English

It was two yojanas in the east, half a yojana otherwise. There was the river Varana; between the two is Varanasi.

अध्याय 112

श्लोक 7

अत्र स्नानं जपो होमो मरणं देवपूजनं ।श्राद्धं दानं निवासश् च यद्यत् स्याद्भुक्तिमुक्तिदं(८)

atra snānaṃ japo homo maraṇaṃ devapūjanaṃ / śrāddhaṃ dānaṃ nivāsaś ca yadyat syādbhuktimuktidaṃ(8)

हिन्दी अर्थ

शाखाके अनुसार वेदोंके पारंगत विद्वान् शान्तिपाठमें लगे रहें। ऋग्वेदी विद्वान् पूर्व दिशामें श्रीसूक्त,

English

Here bathing, repetition, oblation, death, worship of gods, ancestral rites, giving and residence — whatever it be, gives enjoyment and liberation.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।